मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

मायड़-भासा

झुर्रियों की परतें पड़ गयी हैं

उसके चेहरे पर

आँखों में नीम उदासी नज़र आती है

उम्र के महासागर पार किये हैं

मगर मक़ाम अभी बाक़ी है.......

उसके शब्दों में अनुभव अथाह भरा है

वाणी में अजब रवानी है

उसके गीत सतरंगी छब लिए

वातों-ख्यातों सी कहाँ कहानी है.....

मगर ....

कपूतों ने उसे बिसरा दिया है

भूल बैठे हैं

मायड़ से मिले संस्कार-संस्कृति

और बनने चले हैं

मातृ-हन्ता।

उसे सेवरा बना लीजिये

और उसके आखरों को सिरपेच

शब्दों के तीर

भावों के भाले लेकर

'मानता' के संघर्ष में कूद पड़िये।

मायड़ के अपमान का काळूंस

तुम्हें जीने नहीं देगा

और तुम्हारी पीढ़ियों का भविष्य अँधेरा होगा

हे मायड़-भासा राजस्थानी के

कपूत निजोगे राजस्थानियों !

माँ का मान सहेजो

अरे माँ है वो....मायड़।

ढाई-आखर

आंख्यां सूजी उडीकतां
इतरो काँईं गुमान होग्यो।

फेरूँ-फेरूँ बा'वड़ी
बेरण थारी ओळूँ।
मन रो मिन्दर सून पड़्यो
सूनो कुंकुंम थाळ रोळूँ।

रात रूवाणै कागला
रूसेड़ो भगवान् होग्यो ।

झालो दे'र बुलावै है
खेजड़ली रा खोख्र्या।
थारो नाम खुदेड़ो रे'सी
डूंगर खम्बा पोख्र्या।

बाटड़ली रो जोव्णों
म्हारो वेद पुराण होग्यो।

करड़ी घणी कुर्ळावै कुरजां
काट-काट नीं खावै है ।
नेह निरो'ई इतरो गै'रो
मन रा तार बजावै है ।

उतरूँ-उतरूँ डूबूँ -डूबूँ
'ढाई -आखर' ज्ञान होग्यो.

गुरुवार, 8 अप्रैल 2010

चांदनी जब चाँद से छिटककर

रेत पर पसर जाती है ,

रात की दुल्हन हौले-हौले

चांदी सी संवर जाती है ,

दूर दिशाओं के कानों तक

चुपके-चुपके ख़बर जाती है ,

प्रेम-संदेशा लिए हवा तब

लहराती सी गुज़र जाती है.

रविवार, 4 अप्रैल 2010

शनिवार, 3 अप्रैल 2010

याद में रोशन

गुनाह कोई और कर गए होंगे।
और इल्ज़ाम मेरे सर गए होंगे।

ओढ़ कर किरणों की जो चादर आए
जगा कर बस्ती को सहर गए होंगे।

तमाम उम्र जिनके ख़्वाब नवाबी
गुज़ार कर मुफ़लिसी गुज़र गए होंगे।

हर शाम है जिनकी याद में रोशन
ख़्यालों में वो भी संवर गए होंगे।

शुक्रवार, 2 अप्रैल 2010

ऐ ज़िन्दगी मेरी तुझमें भी कुछ असर होता ।
वक़्त थोड़ा ही सही जो खुद की नज़र होता ।

मंथन किये हैं उम्र भर अमृत की आस में
जब भी हिस्सा हुआ उसके हिस्से ज़हर होता ।

बेमियादी हो गए सब बेजुबान जज़्बे
रोशनी बोलती जो चरागों में असर होता ।

जवानी भर निभाया ये दस्तूर हमने
हाथ में फूल आँख में ज़माने का डर होता ।

सीख ही जाते दुश्मनी के कायदे तमाम
घर में मेरे भी दोस्तों का जो बसर होता ।