बुधवार, 28 जुलाई 2010

कविता और रोहिडे का फूल

कविता
एक रोहिड़े का फूल है
गर्मियाँ कसमसाती हैं
भीतर कहीं गहरे तो
रोहिड़ा सुर्ख़ सा सिर तान
धरा पर कौंध उठता है

आस पास जब
सारी निशानियों के पर उतर जाते हैं
अस्तित्वों के ढूह
शुष्क और बंजर नज़र आते हैं
न मालूम
कहाँ से शेष बची कुछ लालिमा को
यत्न से निथारकर
रोहिड़ा
तड़पती प्रेमिका की धरती पर
प्रेम के दो फूल टांक देता है

रोहिड़े का यह फूल
मेरी कविता है

हवा की बेचैनियाँ
जब करवट बदलती हैं
ठन्डे आकाश की बाँहों में
अंगड़ाई लेने लगती है जब
बादलों की तप्त अभिलाषाएँ
झुलसती आँख में आँसू सी
कविता मुस्कुराती है
ठीक वैसे ही
धरती की पथराई प्यास के सीने पर
धर कर अपने पाँव
उगते सूरज का मुखौटा पहन
गर्मियों की भीड़ में एक अकेला
रोहिड़ा ही है
जो कविता की तरह
रेत के चेहरे पर छप जाता है ।

रविवार, 18 जुलाई 2010

अन्नदाता हैं हमारे

सहते रहो पीठ पर
लातों के सन्नाटेदार चाबुक
अन्नदाता हैं हमारे

ये अमिट स्याही नहीं
कलंक है लोकतंत्र की उँगलियों पर
यही द्रोणाचार्य फिर
उखाड़ेंगे उँगलियों से नाखून
तुम्हें तुम्हारी शताब्दियों पुरानी
सहिष्णुता की कसम
उफ़ तक न करना

मिट्टी की कोख से जन्मे
लौंदे हो तुम
अपने आकार को तरसते रहो
तालियाँ पीटो
उनकी रंगीन आकृतियाँ देखकर
इस मिट्टी में यकायक
दरार नहीं हो सकती कभी
तीव्र गर्जन तर्जन के साथ
पाँवों में तुम्हारे
कंठ तक पहुँची
शिक्षाओं का धुआँ अटका है
कंठ में तुम्हारे
शिखर तक लगी
बेड़ियों के स्वर झूलते हैं

महाशयों की पताकाएँ हैं वो
दंडवत हो जाओ
होठों को बुझाने से बेहतर
सलीका नहीं जीने का

ये मजबूत कन्धों की जमात
तुम्हें भी ढो लेगी
अन्नदाता हो हमारे

शनिवार, 10 जुलाई 2010

ले धूप खिला


ओ सूरज

ले धूप खिला !


चाँद का कन्धा थपथपा

हल्के - हल्के कर विदा

हवाओं को उजला अहसास करा

ले धूप खिला

बच्चों के बस्तों में भर दे

मुस्कुराहट की चासनी के शक्करपारे

बड़ों की भीड़ का बोझ हटा

ले धूप खिला

धरती सूख न जाए

बादलों को मनुहारें आ

इस दर को दूर कर

पानी को पाप से बचा

ले धूप खिला


लड़कियों के दुपट्टों की

दूर कर सारी सलवटें

उम्र के माने बता

ले धूप खिला

मंदिर की अँधेरी छाया को

बच्चों की मुट्ठियों से दूर रख

वहाँ दो पेड़ लगा

ले धूप खिला


शहर की गलियाँ

सहेजन की फलियाँ

एक सी दिखें

कुछ यंत्र सुझा

ले धूप खिला

ओ सूरज

ले धूप खिला !

शनिवार, 3 जुलाई 2010

ग़ज़ल




हँसते तारे गाता चाँद ।


देखा है मुस्काता चाँद ।




प्रेम संदेशा ले मेरा


तेरी गलियाँ जाता चाँद ।




कितना रोए ख़त पढ़कर

आकर मुझे बताता चाँद ।




उसके जैसा दिखता तू


सुन - सुन कर शरमाता चाँद ।




चटख चाँदनी चूम चला


बहका सा मदमाता चाँद ।




सूंघ हवाएँ धरती की


चिंता से घबराता चाँद ।




छोड़ अकेला जाओगे


इक दिन,मुझे पता था चाँद ।

रविवार, 27 जून 2010

नमी कायम है


सब अपनी अपनी लय में गाते हैं

तुम भी गाओ

यह गीत

अलापो चाहे

या फिर टेक लो

साज सजे तो सजाओ

लेकिन इस गीत को गाओ

उगे हों भले ही

कंठ में

शूलों के बाड़े

या फिर रोप जाता हो कोई

रेत रंगे आकाश में

अँधेरे की

पंखों वाली कीड़ियों के बीज

सुर ताल के

इस अकाल में भी

शब्दों की नमी

अभी कायम है बराबर

तुम अपनी जड़ों से

पूछकर देखो

दो एक पुरानी धुनें

बची होंगी अवश्य

उन्हीं को सींचो

सींचकर साधो

बहुत बासी नहीं हुआ अभी

ये गीत जीवन का ।

मंगलवार, 22 जून 2010

ऊँट के प्रति


हजारों साल बीते

तेरी एक आह तक

सुनी नहीं हमने

न जाने कितने घावों को

अपनी गर्दन पे झेला

कितने 'चंद' कवियों के विरुद सुने

अगणित प्यासों से

अपनी कूबड़ सजाई

रेत के कितने घाव भरे होंगे

तेरे इन जाजमी पाँवों में ।


तू रोया नहीं शायद सदियों से

इन आँखों में देखे हैं

उमड़ते आँसुओं के बादल

रो ले अगर तू एक बार साथी

इन बादलों का बोझ हल्का हो

क्यों धरा - सा

धीर धारा है तूने ।


सँवारा जाता है

सजाया जाता है तू

बेगानों की भीड़ में

बरसती तालियाँ तुझ पर

कलेजे पर मगर मरहम

लगाकर कौन पुचकारा ?


अकालों के चन्दन

तेरे माथे पे फबते हैं

कराहों के ककहरे

मगर सीखे नहीं अब तक

तू धन्य रे भागी

मायड़ का मान रखें कैसे

सीखे तो कोई तुझसे सीखे

सदियों सूर-सा विचरा

फलेंगी शुभकामनाएँ भी

निर्मल ह्रदय का प्रार्थी है तू

कि सच्चा सारथी है तू

मगर अब ..

थका -थका सा दिखता है तू

थमा-थमा सा नज़र आता है

रेत के इस अविरल प्रवाह में

हकबका सा नज़र आता है ।


ले आ !

सजाऊं गोरबंद तुझ पर

गले में दाल दूँ भुज -माला
कि मुझसे बेहतर कौन

समझे जो तेरी पीड़ को साथी !

शुक्रवार, 18 जून 2010

सांझ


छिपते - छिपाते सांझ आ गई

किरणों ने आख़िरी बार चूमा

मंदिर के शिखर को

और सीढ़ियाँ उतर गईं ।


गाँव भर का धुआँ

धान की धुन में रमा

रोटियों की चटर- पटर से

घर - घर में कोलाहल

चाँद ने पोखर से पूछा

अपनी सूरत निहार लूँ !


धीरे - धीरे चाँद ने

पथ बुहार दिए

अभिसारिकाओं के

अँधेरे ने देखा लजाती सांझ को

और मुस्काने लगा

होंठ काटती सांझ

समा गई चुपके से

अँधेरे की भुजाओं में ।


आकाश से परियों का टोला उतरा

पूरे गाँव में पसर गया।