
फ़लक पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं l
कि तेरे गेसुओं की बावली बलाएँ हैं l
तपती धरती रूठ गयी तो बरखा फिर
बरसी कि जैसे आकाश की अदाएँ हैं l
ऊपर से सब भीगा भीतर सूख चला
न जाने कौन से मौसम की हवाएँ हैं l
पिघल के रहती हैं ये आखिर घटाएँ
बिखरे दूर तक जब प्यास की सदाएँ हैं l
फूल पत्तियाँ देहरी आँगन चौबारे
चाँद से उतरी फरिश्तों की दुआएँ हैं l





