शनिवार, 4 सितंबर 2010

साँवली घटाएँ हैं


फ़लक पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं l


कि तेरे गेसुओं की बावली बलाएँ हैं l


तपती धरती रूठ गयी तो बरखा फिर


बरसी कि जैसे आकाश की अदाएँ हैं l


ऊपर से सब भीगा भीतर सूख चला


न जाने कौन से मौसम की हवाएँ हैं l


पिघल के रहती हैं ये आखिर घटाएँ


बिखरे दूर तक जब प्यास की सदाएँ हैं l


फूल पत्तियाँ देहरी आँगन चौबारे


चाँद से उतरी फरिश्तों की दुआएँ हैं l

रविवार, 15 अगस्त 2010

नदी


आस्था के पुष्पों

और मुर्दों ने तुझे लील लिया

बाज़ार के टापू धड़धड़ाते रहे

सीने पर तेरे

पर्वतों की कृपणता ने तुझे कील लिया

पुरानी तस्वीरों और स्मृतियों के घेरे

तुझे आकाशगंगा बना देंगे

पद-चिह्नों की धूल

चकाचौंध में दुबक तमाम हो रही


कुछ उजले हाथ अपर्याप्त हैं

ये ध्वजाएँ बहुत थोड़ी हैं

भीड़ के भेजे में कौन उकेरे

तेरे दर्दनाक हादसों की टीस


उपाधियों और नामकरणों की

इस समूची पीढ़ी की पैदावार छोड़िये

उन टापुओं की मोहिनी माया

पेट को रोटी दे न दे

वंशजों के वृक्ष को मट्ठा अवश्य देगी l


मंगलवार, 3 अगस्त 2010

भाषा के सवाल पर

भाषा को जुलूस की शक्ल देना
कंठ की विवशता ही तो है
वरना शब्दों के विज्ञापन
श्लीलता की सीमा के बाहर की चीज़ है

माँ के गर्भ में मिले शब्द
जब घुटन महसूसने लगे
तो समझिये
एक भाषा के गर्भपात का षड्यंत्र जारी है

उनकी अपनी धरोहरें हैं
इन्हीं शब्दों के संग्रहालयों में सजी
इस बहाने देखिएगा ये सभी
संस्कृति के शवदाह-गृह में बदल जाएँगे

अपनी माटी की सुगंध सनातन होती है
अक्षरों के बीज जब मौसम छीन लेगा
गूंगी फसलें बांझपन की
हवाओं में शब्दों के अभिशाप देखेंगी

यह एक विचित्र कथा-यात्रा है
करोड़ों कंठों की जाजम धरने पर बैठी है
इनके पृष्ठ फडफडा रहे हैं ..देर से
एक दलदल है
जिसने इस विवशता को संगीन समझा है

बुधवार, 28 जुलाई 2010

कविता और रोहिडे का फूल

कविता
एक रोहिड़े का फूल है
गर्मियाँ कसमसाती हैं
भीतर कहीं गहरे तो
रोहिड़ा सुर्ख़ सा सिर तान
धरा पर कौंध उठता है

आस पास जब
सारी निशानियों के पर उतर जाते हैं
अस्तित्वों के ढूह
शुष्क और बंजर नज़र आते हैं
न मालूम
कहाँ से शेष बची कुछ लालिमा को
यत्न से निथारकर
रोहिड़ा
तड़पती प्रेमिका की धरती पर
प्रेम के दो फूल टांक देता है

रोहिड़े का यह फूल
मेरी कविता है

हवा की बेचैनियाँ
जब करवट बदलती हैं
ठन्डे आकाश की बाँहों में
अंगड़ाई लेने लगती है जब
बादलों की तप्त अभिलाषाएँ
झुलसती आँख में आँसू सी
कविता मुस्कुराती है
ठीक वैसे ही
धरती की पथराई प्यास के सीने पर
धर कर अपने पाँव
उगते सूरज का मुखौटा पहन
गर्मियों की भीड़ में एक अकेला
रोहिड़ा ही है
जो कविता की तरह
रेत के चेहरे पर छप जाता है ।

रविवार, 18 जुलाई 2010

अन्नदाता हैं हमारे

सहते रहो पीठ पर
लातों के सन्नाटेदार चाबुक
अन्नदाता हैं हमारे

ये अमिट स्याही नहीं
कलंक है लोकतंत्र की उँगलियों पर
यही द्रोणाचार्य फिर
उखाड़ेंगे उँगलियों से नाखून
तुम्हें तुम्हारी शताब्दियों पुरानी
सहिष्णुता की कसम
उफ़ तक न करना

मिट्टी की कोख से जन्मे
लौंदे हो तुम
अपने आकार को तरसते रहो
तालियाँ पीटो
उनकी रंगीन आकृतियाँ देखकर
इस मिट्टी में यकायक
दरार नहीं हो सकती कभी
तीव्र गर्जन तर्जन के साथ
पाँवों में तुम्हारे
कंठ तक पहुँची
शिक्षाओं का धुआँ अटका है
कंठ में तुम्हारे
शिखर तक लगी
बेड़ियों के स्वर झूलते हैं

महाशयों की पताकाएँ हैं वो
दंडवत हो जाओ
होठों को बुझाने से बेहतर
सलीका नहीं जीने का

ये मजबूत कन्धों की जमात
तुम्हें भी ढो लेगी
अन्नदाता हो हमारे

शनिवार, 10 जुलाई 2010

ले धूप खिला


ओ सूरज

ले धूप खिला !


चाँद का कन्धा थपथपा

हल्के - हल्के कर विदा

हवाओं को उजला अहसास करा

ले धूप खिला

बच्चों के बस्तों में भर दे

मुस्कुराहट की चासनी के शक्करपारे

बड़ों की भीड़ का बोझ हटा

ले धूप खिला

धरती सूख न जाए

बादलों को मनुहारें आ

इस दर को दूर कर

पानी को पाप से बचा

ले धूप खिला


लड़कियों के दुपट्टों की

दूर कर सारी सलवटें

उम्र के माने बता

ले धूप खिला

मंदिर की अँधेरी छाया को

बच्चों की मुट्ठियों से दूर रख

वहाँ दो पेड़ लगा

ले धूप खिला


शहर की गलियाँ

सहेजन की फलियाँ

एक सी दिखें

कुछ यंत्र सुझा

ले धूप खिला

ओ सूरज

ले धूप खिला !

शनिवार, 3 जुलाई 2010

ग़ज़ल




हँसते तारे गाता चाँद ।


देखा है मुस्काता चाँद ।




प्रेम संदेशा ले मेरा


तेरी गलियाँ जाता चाँद ।




कितना रोए ख़त पढ़कर

आकर मुझे बताता चाँद ।




उसके जैसा दिखता तू


सुन - सुन कर शरमाता चाँद ।




चटख चाँदनी चूम चला


बहका सा मदमाता चाँद ।




सूंघ हवाएँ धरती की


चिंता से घबराता चाँद ।




छोड़ अकेला जाओगे


इक दिन,मुझे पता था चाँद ।