
फ़लक पे झूम रहीं साँवली घटाएँ हैं l
कि तेरे गेसुओं की बावली बलाएँ हैं l
तपती धरती रूठ गयी तो बरखा फिर
बरसी कि जैसे आकाश की अदाएँ हैं l
ऊपर से सब भीगा भीतर सूख चला
न जाने कौन से मौसम की हवाएँ हैं l
पिघल के रहती हैं ये आखिर घटाएँ
बिखरे दूर तक जब प्यास की सदाएँ हैं l
फूल पत्तियाँ देहरी आँगन चौबारे
चाँद से उतरी फरिश्तों की दुआएँ हैं l
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है!
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भारत के पूर्व राष्ट्रपति
डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म-दिन
शिक्षकदिवस की बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!