शनिवार, 24 अप्रैल 2010

ग़ज़ल

धुएं सी रात के लब सिले-सिले से लगते हैं।
शबनमी कतरे आँख में पिघले से लगते हैं।

रात भर महकी रातरानी के निशाँ हैं ये
कलेजे के पत्थर थोड़े हिले से लगते हैं।

बोल कर बता देगी ये शाम मुझको चुपके से
दिल के आंसू आँख में निकले से लगते हैं।

चांदनी छिप-छिप के सहला रही है जज़्बात
बेकाबू हैं,साँसों के काफ़िले से लगते हैं।

तुम लाख छिपाओ तबस्सुम के तले लेकिन
होठों पे जो फैले हैं ,गिले से लगते हैं.

2 टिप्‍पणियां:

  1. वाह !!!!!!!!! क्या बात है..... बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति,

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  2. चांदनी छिप-छिप के सहला रही है जज़्बात
    बेकाबू हैं,साँसों के काफ़िले से लगते हैं।
    waah

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