गुरुवार, 16 जून 2011

तीन छोटी कविताएँ

एक 

रात के छिद्रों में
फूँकता है कोई प्राण 
बाँसुरी मचल उठती है 

तम की लहरियाँ 
छेड़ती हैं धमनियों को 
एक तुम नहीं 
रात का यौवन व्यर्थ 

दो 

जीवन बाँस बन बैठा है
फूल न खिले
तो अकाल सा दिखता है 
खिल गए फूल अगर 
तो अकाल के अंदेशे में 
पत्थर मारते हैं लोग 


तीन  

घर 
मेरे होने को सार्थक करता है 
मैं समेट देता हूँ 
घर के होने को 
एक कोने में 

अब घर में मैं निरर्थक हूँ 
और घर मुझमें 


9 टिप्‍पणियां:

  1. अब घर में मैं निरर्थक हूँ
    और घर मुझमें
    ......... aur ek sannata hamare bich.

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  2. एक तुम नहीं
    रात का यौवन व्यर्थ
    बेह्द खूबसूरत रचनाएँ

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  3. तीनों ही बिम्ब बहुत सुंदर बन पड़े हैं ! आभार!

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  4. तीनों कविताएं तीन अलग भाव-संसार में ले जाती हुईं...
    बहुत सुन्दर...

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  5. खिल गए फूल अगर
    तो अकाल के अंदेशे में
    पत्थर मारते हैं लोग ||
    bahut khoob :)
    ___________________________
    मैं , मेरा बचपन और मेरी माँ || (^_^) ||

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  6. ghr to vistar ki mang krta hai use ek kone me smet dene se apna vyktitv jane anjane sikud jata hai is bhav ko bkhoobi aapne abhivykt kiya hai

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  7. डॉ. शरद सिंह ने जो कहा अक्षरशः सत्य - सुखद अनुभूति - हार्दिक बधाई - बहुत देर बाद आ सका

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