मंगलवार, 7 जून 2011

तुम तक कैसे पहुँचे दर्द मेरा

तुम तक कैसे पहुँचे दर्द मेरा 

तुम्हें दर्द देना नहीं 
परिचित कराना है 
इन स्वरों और सुरों से 
ताकि बाद के दिनों में 
दर्द तुम्हें अपना सा लगे 

तुम अपनी मुस्कुराहटें मुझे भेज दो 

मैं भी हँसता हूँ 
खुश हूँ 
मगर किसी और के हाथों से मरहम 
बड़ा सुकून देता है 

और ये जो सम्प्रेषण है 
समय की क्रूरता से मुक्ति दिलाता है 
सचमुच       

9 टिप्‍पणियां:

  1. सम्प्रेषण बना रहे। यही सबसे अधिक ज़रूरी है।

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  2. मैं भी हँसता हूँ
    खुश हूँ
    मगर किसी और के हाथों से मरहम
    बड़ा सुकून देता है
    ....
    खूब चैन सा

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  3. तुम अपनी मुस्कुराहटें मुझे भेज दो
    किसी और के हाथों से मरहम
    बड़ा सुकून देता है.... sach hai

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  4. सुख-दुःख, लेन-देन चलता रहे...यही तो जिंदगी है...सुंदर रचना !

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  5. तुम्हें दर्द देना नहीं
    परिचित कराना है
    इन स्वरों और सुरों से
    ताकि बाद के दिनों में
    दर्द तुम्हें अपना सा लगे


    बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति..बहुत सुन्दर ...

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  6. वाह !
    बहुत खूब !
    अतिसुन्दर !
    पूरे सबाब पर हो आजकल !
    मानो तपते थार में रोहिडा़ जेठ की इस दुपहरी में अपने पुष्प खिलाए खडा़ हो !
    बहुत-बहुत बधाई ! जीयो !
    इन पंक्तियों के लिए---जय हो -
    "और ये जो सम्प्रेषण है
    समय की क्रूरता से मुक्ति दिलाता है
    सचमुच "
    =============================
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    ==============================

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  7. यह पंक्तियां भी भाईं-
    ============जय हो चैनसिंह भाई !===============
    तुम्हें दर्द देना नहीं
    परिचित कराना है
    इन स्वरों और सुरों से
    ताकि बाद के दिनों में
    दर्द तुम्हें अपना सा लगे

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