रविवार, 27 जून 2010

नमी कायम है


सब अपनी अपनी लय में गाते हैं

तुम भी गाओ

यह गीत

अलापो चाहे

या फिर टेक लो

साज सजे तो सजाओ

लेकिन इस गीत को गाओ

उगे हों भले ही

कंठ में

शूलों के बाड़े

या फिर रोप जाता हो कोई

रेत रंगे आकाश में

अँधेरे की

पंखों वाली कीड़ियों के बीज

सुर ताल के

इस अकाल में भी

शब्दों की नमी

अभी कायम है बराबर

तुम अपनी जड़ों से

पूछकर देखो

दो एक पुरानी धुनें

बची होंगी अवश्य

उन्हीं को सींचो

सींचकर साधो

बहुत बासी नहीं हुआ अभी

ये गीत जीवन का ।

5 टिप्‍पणियां:

  1. तुम अपनी जड़ों से

    पूछकर देखो

    दो एक पुरानी धुनें

    बची होंगी अवश्य

    उन्हीं को सींचो

    सींचकर साधो

    बहुत बासी नहीं हुआ अभी

    ये गीत जीवन का ।
    बहुत सार्थक और गहरे भाव हैं कविता मे । बधाई।

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  2. बहुत सुन्दर रचना..बधाई.


    ***************************
    'पाखी की दुनिया' में इस बार 'कीचड़ फेंकने वाले ज्वालामुखी' !

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  3. तुम अपनी जड़ों से

    पूछकर देखो

    दो एक पुरानी धुनें

    बची होंगी अवश्य

    उन्हीं को सींचो

    सींचकर साधो

    बहुत बासी नहीं हुआ अभी

    ये गीत जीवन का ।

    सही कहा जड़ों को सींचते रहना चाहिए वर्ना सूखने का डर रहता है .....!!

    सुंदर भाव ....!!

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  4. बहुत बासी नहीं हुआ अभी

    ये गीत जीवन का ।

    Beautiful expression !

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