शुक्रवार, 18 जून 2010

सांझ


छिपते - छिपाते सांझ आ गई

किरणों ने आख़िरी बार चूमा

मंदिर के शिखर को

और सीढ़ियाँ उतर गईं ।


गाँव भर का धुआँ

धान की धुन में रमा

रोटियों की चटर- पटर से

घर - घर में कोलाहल

चाँद ने पोखर से पूछा

अपनी सूरत निहार लूँ !


धीरे - धीरे चाँद ने

पथ बुहार दिए

अभिसारिकाओं के

अँधेरे ने देखा लजाती सांझ को

और मुस्काने लगा

होंठ काटती सांझ

समा गई चुपके से

अँधेरे की भुजाओं में ।


आकाश से परियों का टोला उतरा

पूरे गाँव में पसर गया।

5 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति का मानवीकरण सदा आनन्द प्रदान करता है...जितने सुन्दर प्रतीक उतनी ही सुन्दर बिम्ब योजना.....बेहतरीन कविता..बधाई।

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  2. होंठ काटती सांझ

    समा गई चुपके से

    अँधेरे की भुजाओं में ।
    amazing

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  3. भाई चैध सिँह जी,
    बहुत अच्छी कविता के लिए बधाई।
    अब तो आप छा रहे हैँ।क्या ग़ज़ब की प्रतीकात्मकता है आपके वाक्यविन्यास मेँ!पढ़ते ही सकून मिलता है।

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  4. प्रकृति के रूप का सुन्दर चित्रण किया दै आपने चैन जी।

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति।
    सरलता और सहजता का अद्भुत सम्मिश्रण बरबस मन को आकृष्ट

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