रविवार, 18 जुलाई 2010

अन्नदाता हैं हमारे

सहते रहो पीठ पर
लातों के सन्नाटेदार चाबुक
अन्नदाता हैं हमारे

ये अमिट स्याही नहीं
कलंक है लोकतंत्र की उँगलियों पर
यही द्रोणाचार्य फिर
उखाड़ेंगे उँगलियों से नाखून
तुम्हें तुम्हारी शताब्दियों पुरानी
सहिष्णुता की कसम
उफ़ तक न करना

मिट्टी की कोख से जन्मे
लौंदे हो तुम
अपने आकार को तरसते रहो
तालियाँ पीटो
उनकी रंगीन आकृतियाँ देखकर
इस मिट्टी में यकायक
दरार नहीं हो सकती कभी
तीव्र गर्जन तर्जन के साथ
पाँवों में तुम्हारे
कंठ तक पहुँची
शिक्षाओं का धुआँ अटका है
कंठ में तुम्हारे
शिखर तक लगी
बेड़ियों के स्वर झूलते हैं

महाशयों की पताकाएँ हैं वो
दंडवत हो जाओ
होठों को बुझाने से बेहतर
सलीका नहीं जीने का

ये मजबूत कन्धों की जमात
तुम्हें भी ढो लेगी
अन्नदाता हो हमारे

14 टिप्‍पणियां:

  1. चैनसिंह जी
    हमेशा की तरह एक शानदार रचना आपने फिर लिखी है
    आपको बधाई.

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  2. ये अमिट स्याही नहीं
    कलंक है लोकतंत्र की उँगलियों पर
    यही द्रोणाचार्य फिर
    उखाड़ेंगे उँगलियों से नाखून
    तुम्हें तुम्हारी शताब्दियों पुरानी
    सहिष्णुता की कसम
    उफ़ तक न करना

    ह्रदय-स्पर्शी ....
    बहुत कुछ सोचने को विवश करती है रचना...!!

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  3. रचना ने समूचा चित्र खींच दिया विसंगति का ।
    प्रशंसनीय ।

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  4. तुम्हें तुम्हारी शताब्दियों पुरानी
    सहिष्णुता की कसम
    उफ़ तक न करना..... waah

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  5. saja-sanvaraa blog...saji-sanvaree kaivataen bhi. achchha lagaa. shubhkamanae.

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  6. सहते रहो पीठ पर
    लातों के सन्नाटेदार चाबुक
    अन्नदाता हैं हमारे

    इतने सुन्दर अभिव्यक्ति के बारे में कुछ कहना उचित नहीं है
    लाजवाब

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  7. jabardasht kavita mere bhayi ... kya khoob likha hai , main to sochkar hi chup ho gaya hoon .. kudos boss.

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  8. आज पहली बार यहाँ आना हुआ | बहुत सुखद लगा यह ब्लॉग देखकर |

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  9. सहते रहो पीठ पर
    लातों के सन्नाटेदार चाबुक
    अन्नदाता हैं हमारे

    बिकुल सटीक लिखा है.....कवि के हृदय में उठता हुआ ज्वार साफ़ नज़र आता है...

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  10. आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

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  11. मंगलवार 27 जुलाई को आपकी रचना ... चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर ली गयी है .कृपया वहाँ आ कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ .... आभार

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  12. तुम्हें तुम्हारी शताब्दियों पुरानी
    सहिष्णुता की कसम
    उफ़ तक न करना ..

    अक्सर पीडियाँ सहती रहती रहती हैं ... विद्रोह घुटता रहता है ...... बहुत शशक्त अभिव्यक्ति है ....

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  13. बहुत सुन्दर....भावपूर्ण शब्दों से सजी रचना.

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